शुक्रिया या शिकायत Meditate to beat Stress

शुक्रिया - ऐ परवरदिगार

मेरी जिंदगी में आने के लिए, हर लम्हे को इतना खूबसूरत बनाने के लिए, तू है तो हर खुशी पर मेरा नाम लिख गया है। शुक्रिया मुझे इतना खुशनसीब बनाने के लिए।

अपने अनुभव से कह रही हूं, जिस दिन आपको शुक्र करना आ जाएगा, उसी दिन आपके जीवन से सारी शिकायते समाप्त हो जाएंगी। आपको किसी का दोष नहीं दिखेगा, जिस दिन उस परवरदिगार का शुक्र करना आएगा।

आप थोड़ा सा तो विचार कीजिए, कि आपके पास क्या नहीं है। भजन करने के लिए भगवान ने तन दिया है, चिंतन करने के लिए भगवान ने मन दिया है। उसी शक्ति ने विचार करने की सामर्थ्य दी है, स्वयं के कल्याण के लिए। इससे अधिक आपको क्या चाहिए। ध्यान रहे जीवन में जो भी प्राप्त है, वही पर्याप्त है। और यह भी याद रहे, कि जीवन में जो भी आवश्यकता से अधिक है वह विष है, वह आपको पीड़ा देगा। एक बार आवश्यकता से अधिक जीवन में संचय करके देखिए, आपके मन का विश्राम समाप्त हो जाएगा।आवश्यकता से अधिक तो बस एक ही चीज अच्छी लगती है, वह है भगवान का भजन, सुमिरन, ध्यान साधना उसकी कोई सीमा नहीं है। लोभ करना है, तो भजन का लोभ करिए। आपको भजन, सुमिरन, उसकी याद कभी पर्याप्त ना लगे। जितना भी याद करो उतना ही अधूरापन लगे।

उसकी याद की कसौटी यही है, कि जितना उसे याद करते चले जाओगे। उतना ही आप भीतर से भरपूर होते चले जाओगे। कबीर जी ने भी कहा...

कागा सब तन खाइयो। चुन चुन खाइयो मांस। दो नैना मत खाइयो,इन्हें पिया मिलन की आस

लोभ हो तो उसकी याद का हो। क्रोध करना है तो अपने मन की चंचलता पर करना है। किसी भी वस्तु को या स्वयं को समाप्त नहीं करना, बल्कि उसका सदुपयोग करना है। पल-पल होश में निकले। इस संसार में कुछ भी निरर्थक नहीं है, केवल एक ही वस्तु निरर्थक है उसका कोई अर्थ नहीं उसका कोई मोल नहीं है। वह है हमारा अभिमान, अपने को मन के हाथों में सौंप देना या सिर्फ मन होकर जीना यही है... जीवन की सबसे बड़ी दुर्घटना।

मन के हाथ लगा जीवन बहुत मनोरोगो और हृदय रोगों का शिकार होता है। बहुत नेगेटिविटीज, बहुत शंकाएं, बहुत डर का अंधेरा पिरोता है। माइंड तनिक मात्र भी चैन नहीं लेने देता। हर पल बेचैनी और तनाव को पैदा करता ही रहता है। इसके लिए आप दूसरों को जिम्मेवार ठहराते हुए दूसरों को दोषी कहते हो। नहीं..... कोई पद प्रतिष्ठा, सामान, सम्मान, संपत्ति, संबंध कोई कारण नहीं है। इस मन के दुखों का कारण तुम स्वयं हो। इस भीतर की बेचैनी का कोई दूसरा कारण नहीं है। तुम स्वयं जुड़े हो, इस माइंड से.... माइंड बहिर्मुखी है माइंड बाहर से Borrow करता है, बाहर से इंपोर्ट करता है। जो जो नेगेटिव है, उसको पकड़ता है। तमाम कचरा इकट्ठा करता है, शिकायतें करता है, शिकवे करता है, अगर तुम थोड़ी देर माइंड से हट जाओ, तो यह शांत मौन मुदित भाव में निरंतर तुम्हारे इशारों पर हो जाता है। कदाचित भी फिर तुम अंधेरों में नहीं रह सकते। आप स्वयं अनुभव लेना भीतर का और फिर भीतर से ही शुक्रिया का भाव उठता है मन कह उठता है....

मुझे अपने आप में, कुछ यूं बसा लो

कि ना रहूं जुदा तुमसे और खुद से

मैं तुम हो जाऊं

Om Namah

व्याकरण संबंधी त्रुटि के लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूं।

Thank you so much

Antas Yog by Indu Jain

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Om Guruve Namah

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