शुक्रिया या शिकायत Meditate to beat Stress

शुक्रिया - ऐ परवरदिगार

मेरी जिंदगी में आने के लिए, हर लम्हे को इतना खूबसूरत बनाने के लिए, तू है तो हर खुशी पर मेरा नाम लिख गया है। शुक्रिया मुझे इतना खुशनसीब बनाने के लिए।

अपने अनुभव से कह रही हूं, जिस दिन आपको शुक्र करना आ जाएगा, उसी दिन आपके जीवन से सारी शिकायते समाप्त हो जाएंगी। आपको किसी का दोष नहीं दिखेगा, जिस दिन उस परवरदिगार का शुक्र करना आएगा।

आप थोड़ा सा तो विचार कीजिए, कि आपके पास क्या नहीं है। भजन करने के लिए भगवान ने तन दिया है, चिंतन करने के लिए भगवान ने मन दिया है। उसी शक्ति ने विचार करने की सामर्थ्य दी है, स्वयं के कल्याण के लिए। इससे अधिक आपको क्या चाहिए। ध्यान रहे जीवन में जो भी प्राप्त है, वही पर्याप्त है। और यह भी याद रहे, कि जीवन में जो भी आवश्यकता से अधिक है वह विष है, वह आपको पीड़ा देगा। एक बार आवश्यकता से अधिक जीवन में संचय करके देखिए, आपके मन का विश्राम समाप्त हो जाएगा।आवश्यकता से अधिक तो बस एक ही चीज अच्छी लगती है, वह है भगवान का भजन, सुमिरन, ध्यान साधना उसकी कोई सीमा नहीं है। लोभ करना है, तो भजन का लोभ करिए। आपको भजन, सुमिरन, उसकी याद कभी पर्याप्त ना लगे। जितना भी याद करो उतना ही अधूरापन लगे।

उसकी याद की कसौटी यही है, कि जितना उसे याद करते चले जाओगे। उतना ही आप भीतर से भरपूर होते चले जाओगे। कबीर जी ने भी कहा...

कागा सब तन खाइयो। चुन चुन खाइयो मांस। दो नैना मत खाइयो,इन्हें पिया मिलन की आस

लोभ हो तो उसकी याद का हो। क्रोध करना है तो अपने मन की चंचलता पर करना है। किसी भी वस्तु को या स्वयं को समाप्त नहीं करना, बल्कि उसका सदुपयोग करना है। पल-पल होश में निकले। इस संसार में कुछ भी निरर्थक नहीं है, केवल एक ही वस्तु निरर्थक है उसका कोई अर्थ नहीं उसका कोई मोल नहीं है। वह है हमारा अभिमान, अपने को मन के हाथों में सौंप देना या सिर्फ मन होकर जीना यही है... जीवन की सबसे बड़ी दुर्घटना।

मन के हाथ लगा जीवन बहुत मनोरोगो और हृदय रोगों का शिकार होता है। बहुत नेगेटिविटीज, बहुत शंकाएं, बहुत डर का अंधेरा पिरोता है। माइंड तनिक मात्र भी चैन नहीं लेने देता। हर पल बेचैनी और तनाव को पैदा करता ही रहता है। इसके लिए आप दूसरों को जिम्मेवार ठहराते हुए दूसरों को दोषी कहते हो। नहीं..... कोई पद प्रतिष्ठा, सामान, सम्मान, संपत्ति, संबंध कोई कारण नहीं है। इस मन के दुखों का कारण तुम स्वयं हो। इस भीतर की बेचैनी का कोई दूसरा कारण नहीं है। तुम स्वयं जुड़े हो, इस माइंड से.... माइंड बहिर्मुखी है माइंड बाहर से Borrow करता है, बाहर से इंपोर्ट करता है। जो जो नेगेटिव है, उसको पकड़ता है। तमाम कचरा इकट्ठा करता है, शिकायतें करता है, शिकवे करता है, अगर तुम थोड़ी देर माइंड से हट जाओ, तो यह शांत मौन मुदित भाव में निरंतर तुम्हारे इशारों पर हो जाता है। कदाचित भी फिर तुम अंधेरों में नहीं रह सकते। आप स्वयं अनुभव लेना भीतर का और फिर भीतर से ही शुक्रिया का भाव उठता है मन कह उठता है....

मुझे अपने आप में, कुछ यूं बसा लो

कि ना रहूं जुदा तुमसे और खुद से

मैं तुम हो जाऊं

Om Namah

व्याकरण संबंधी त्रुटि के लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूं।

Thank you so much

Antas Yog by Indu Jain

अगर इन विचारों से आपके जीवन में बदलाव आ रहा है, तो सभी के साथ इन Happy thoughts को शेयर करें, और इस यात्रा में सहभागी बने

Om Guruve Namah

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इस लॉकडाउन में भगवान क्या चाहते हैं ? Spiritual journey

 

उसकी कदर करने में, देर मत करना। जो इस दौर में भी तुम्हें वक्त दे रहा है।


इस एक मनुष्य जीवन में तुम स्वयं को जान लो - "मैं हूं कौन" वास्तव में भगवान भी इस लॉकडाउन में यही चाहते हैं।


इस लॉक डाउन में तीन बातों को अपने माइंड में लॉक कर लेना।

  • पहली पहली बात जीवन सतत गतिशील है, परिवर्तनशील है, तुम्हारी प्लानिंग से जीवन नहीं चलता और जब जीवन ही तुम्हारी प्लानिंग से नहीं चलता, तो मृत्यु कहां तुमसे पूछ कर आने वाली है। एक छोटा सा अदृश्य वायरस तुम्हें अपने घर में बंद कर गया, जब मृत्यु जैसे विराट घटना घटेगी, तुम कहां जाओगे। लेकिन इस समय का भरपूर प्रयोग कैसे किया जा सकता है, वास्तव में यही समय तुम्हें बता सकता है, और कोई नहीं सिखा सकता।
  • दूसरी बात - लॉक डाउन का ये समय तुम्हें कुछ सिखाना चाहता है, कि ठहरो जिसके बिना नहीं रहा जा सकता था, उसके बिना भी सब कुछ ठीक चल रहा है। यह कम आश्चर्य की बात नहीं। कई लोगों को लगता था, हम बिजनेस के बगैर घर पर ठहर ही नहीं सकते, कई महिलाओं को लगता था हम शॉपिंग और किटी के बिना रह नहीं सकते, अब सब कुछ ठीक चल रहा है या नहीं।
  • तीसरी बात - जिंदगी तुम्हें कुछ सिखाना चाहती है, यदि आसान ढंग से नहीं सीखोगे तो जटिल और कठिन ढंग आएगा, क्योंकि God तुम्हें कुछ सिखाना चाहते हैं, ईश्वर चाहते हैं, कि तुम इन मन और शरीर की सीमाओं से बाहर आओ केवल मन बुद्धि और शरीर की गुलामी मे ना रहो। और वही सब कुछ सिखाने के लिए यही दिन आए हैं, कि शायद आजकल इन दिनों में हम सीख जाए, कि यह जीवन किसके लिए मिला था। ठहरने के लिए, ठहर कर हम थोड़ी देर साधना में उतरे। साधना यानी संभलना, सुधारना, self improvement

अपने सुधार के लिए हमें बंद आंखों से थोड़ी देर अपने भीतर उतरना होगा, हमें अपने माइंड पर नजर रखनी होगी, कि कब-कब हम अपने माइंड के साथ जुड़े। सावधान हो जाना यही तो डिस्कवर करना है। इस रियलिटी को खोजना है। और यह बहुत सरल और साधारण है, अपनी और जागना क्या मुश्किल है लेकिन हमने इस तकनीक को कितना जटिल बना दिया। ध्यान रहे भीतर हर स्थिति माइंड की है, बस इस पर नजर रखना। रहना वर्तमान में आना-जाना भूत और भविष्य का हो। याद रहे identification बुरी है। माइंड तुम्हें लेकर चले यह दूरव्यवस्था है, ये mis management है।

Neutral रहकर थोड़ी देर अपने माइंड को ऑब्जर्व करना। लॉकडाउन में बाहर के टेलीविजन को देखने में इतना आनंद नहीं, जितना माइंड के टेलीविजन को देखने में अच्छा लगेगा। तुम स्वयं हंसोगे कि कितनी धूल हमने स्वयं इकटठी की है, क्या नहीं feed किया, अपनी चित्र रूपी कंप्यूटर में अपने चित् में क्या नहीं डाला। कितना बेकार का भरा है, हमने भीतर। लेकिन यह देखना हमें तभी आएगा। जब किसी हायर की वाइब्रेशंस मिलेंगी। भगवान चाहते हैं, कि हम अपने माइंड रुपी कंप्यूटर को कम से कम feed करें। Already जो हमने फीड किया है, उसको विदा करने के लिए यह लॉक डाउन का अवसर मिला है, लेकिन इसके लिए हमें किसी का साथ चाहिए समर्पण चाहिए।

तीरथ नहाए एक फल, संत मिले फल चार। सदगुरु मिले अनंत फल, कहे कबीर विचार।

सतगुरु मिले तो भक्ति की भावना भीतर सिद्ध होती है फिर भक्त कह उठता है सुख पाया सुख पाया रहम तेरी सुख पाया। यही है मन की आनंदित अवस्था.. निर्भार, जहां कोई भार नहीं।

वास्तव में इस समय ईश्वर हमें कुछ सिखाना चाहते हैं, वह यह कि तुम इस मन और शरीर की सीमाओं से बाहर आओ। और वही सब कुछ सिखाने के लिए लॉकडाउन के दिन आए हैं, कि शायद आजकल हम सीख जाएं कि जीवन किसके लिए मिला था, इसका perpose क्या था, वास्तव में यह समय हमें ठहरने के लिए मिला था, कि थोड़ी देर हम देर रुक कर अपनी साधना में उतरे। अपने इंप्रूवमेंट में उतरे लेकिन अभी तो हम खाना और सोना दोनों भूल चुके हैं। पता नहीं विकास का यह कौन सा चरण है, कि हमें सोना और खाना दोनों ही ठीक से नहीं आते खाने के लिए भी दवा चाहिए सोने के लिए भी दवा चाहिए। हंसने के लिए सुबह पार्क में हा हा करना पड़ता है। अब वह भी नहीं, क्योंकि वास्तविक हंसी नहीं है जीवन में। यह कैसी विकृत जीवन शैली है, कितनी जड़ता आ गई है। जिंदगी में जिस गति से चेतना विनाश की ओर जा रही है उससे तो यही लगता है कि अंतर्मुखी जीवन क्या होता है, आनंद क्या होता है यह बात तो हम भूल ही जाएंगे। आप कौन हैं, क्या है, क्यों आए हैं। यह विचार करने की सामर्थ्य बुद्धि में नहीं रहेगी।

अवसर मिला है, भूलना नहीं, थोड़ी देर अपने साथ रहना। तुम्हारा सुख तुम्हारे भीतर है, और उस आंतरिक सुख तक पहुंचने का मार्ग भी भीतर है। समझ तो बहुत लोगों को आ गया है कि मार्ग क्या है, लेकिन उस समझ को अनुभव तक लाने के लिए प्रकृति ने तुम्हारे लिए सारा इंतजाम किया है, ताकि इस लॉक डाउन में थोड़ी देर तुम ठहर जाओ।

ज्यादा कुछ तो नहीं जानती, मैं इस प्रेम के बारे में, इस समर्पण के बारे में, बस तुम सामने आते हो तो तलाश खत्म हो जाती है।

Om Namah

व्याकरण संबंधी त्रुटि के लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूं।

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यह कैसा प्रेम का रंग Spiritual journey

ज्ञान से शब्द समझ आते हैं, लेकिन अनुभव से वास्तविक अर्थ।

किसी की वाइब्रेशंस में थोड़ी देर प्रेममय हो जाना। यह धारा समर्थ है तुम्हें व्यस्त से मस्त कर देने में, लेकिन आप कहते हैं कि मस्त कैसे होए हम ? अभी संसार का उत्तरदायित्व बहुत है, जब भी ध्यान में उतरते हैं मन भागता हैं,अभी responsibilities काफी हैं, दोनों में बैलेंस कैसे साधे, तो क्या करें?

ध्यान रहे, या तो आप अधूरे मन से सुनते हैं, या जो आपको सुनाता है वह अधूरा जानता है, क्योंकि ध्यान तो वो कला है, जिसमें किसी को कपड़ा बुनते बुनते, किसी को जूता बनाते बनाते किसी को सामान तोलते तोलते... तेरा ही तेरा भगवद दर्शन करा दिया। आपने कहीं नहीं भागना। भागने वालों को कुछ नहीं मिला, भागने वालों ने संसार से भागकर दुगना संसार पाया है। इसीलिए जहां हो, वही रहिएगा और जो घर से भागने को कहा उनकी बात बिल्कुल भी नहीं सुनना, क्योंकि करुणानिधान इतनी समर्थ है, वो जब आते हैं तो आने के लिए कौन सा स्थान चुनते हैं। आधी रात, घनघोर बरसता बादल, और कारागार के मध्य में भगवान प्रकट होते हैं। यानी वह शक्ति ऐसी स्थिति में भी प्रगट हो सकती है। भले ही आप और मैं सब कारागार में है, संसार के कारागार में है, जहां कामनाओं के मेघ बरसते हैं, और घोर अंधकार है। बस इतना भरोसा रखना, थोड़ा सा विश्वास रखना।

जब कोई नहीं आता, मेरे गुरुवर आते हैं मेरे दुख के दिनों में वो, बड़े याद आते है।

किसी शायर ने कहा

बहुत चल लिए, चलते चलते थक गए और ना मिली मंजिल नाचीज और यूं तो कहने को चलकर जाना था, जिस्म से मुझे रूह तक।

इतना ही तो चलना था बाहर से भीतर उतरना था। अंतस में जाना था, जिस्म से रूह में उतरना था, बस इतना हो नहीं पाया। बहुत चल लिए बस अब ठहर जाओ उसे आने दीजिए।

अब आप मत खोजिए, उसे आप को खोजने दीजिए। अब आप मत पहचानिए उसे आपको पहचान जाने दीजिए, आप तो बस भीतर डूब जाएं

जिंदगी दी है तो जीने का हुनर भी दे दे गुफ्तगू दी है तो बातों का असर भी दे दे।

मैं किसी और के हाथ से समंदर भी ना लूं। एक कतरा भी समंदर है, तू अगर दे दे।

गुरु की कृपा से नाम मिला हो, बस एक बार अपने तन मन प्राण लगा दीजिए। प्रत्येक प्रश्न के उत्तर में एक बात कहिए अपने आप से...

जीने का सहारा तेरा नाम रे मुझे दुनिया वालों से क्या काम रे...

‌‌किसी की वाइब्रेशंस का जीवन में आना कैसा है, जैसे प्रभु के आगमन का संदेशा आया हो, ध्यान रहे अन्य सब साधनों में प्रयास है, प्रयास में परिश्रम है। पर इस धारा में कोई प्रयास ना हो, सारी कोशिशें छोड़ दीजिए वही है प्रेम, वही है भक्ति का रंग। वही भक्ति शुद्ध है, यह सब कुछ स्वीकार करती है। इसमें सर्व को स्वीकार करने की सामर्थ है, कोई कैसा भी आया हो। केवल अमृत की स्वीकृति ही, भक्ति में नहीं है, अगर केवल अमृत की स्वीकृति होती तो मीरा केवल चरणामृत स्वीकार करती। इसमें विष की भी स्वीकृति है, और केवल स्वीकृति ही नहीं, सामर्थ्य भी है विष को अमृत में परिवर्तित करने का। इसीलिए यह प्रेम शुद्ध है अवरुद्ध है, ध्यान रहे यदि सद्गुरु द्वारा दी गई वो भीतर की दृष्टि ही ना हो, तो भगवान सामने से होकर चले जाएंगे। आप पहचान भी नहीं पाएंगे, इन बाहर के चक्षुओ से भगवद दर्शन नहीं होगा। श्रद्धा और विश्वास के दो नेत्र आपके भाव देह के पास में है। वह श्रद्धा और विश्वास के नेत्र जब देखते हैं तभी भगवान दिखाई देते हैं। और वह नेत्र बिना गुरु कृपा के देख नहीं पाते, बिना नयन पावे नहीं, बिना नयन की बात।

बहुत गहरी बात है, जिनके जीवन में संत कहो, गुरु कहो, कोई बुद्ध पुरुष नहीं होता उनकी चेष्टा बता देती है, इनके जीवन में कोरा सत्संग है, यानी जो सिर्फ सुनने वाला होता है,और बहुत लोग तो ध्यान से सुन भी नहीं पाते, क्योंकि या तो वह देखने के लिए आते हैं कि क्या चल रहा है या स्वयं को दिखाने के लिए आते हैं।

थोड़ी देर बंद आंखों से भीतर झांकना, सभी बुद्ध पुरुषों का एक ही संदेश है, कि यदि तुम मनुष्य जीवन में आ ही गए हो तो, इस मनुष्य जीवन की जो परम संभावना है वहां की यात्रा का आरंभ कीजिए और अंत भी। सत्संग, ज्ञान, ध्यान की धारा तुम्हें सिर्फ दिशा देगी, समझा सकती है, लेकिन साधना तुम्हें स्वयं करनी होगी और वही साधना तुम्हें उस अनुभव तक लेकर जाएगी कि जो भी तुमने सत्संग में समझा है ध्यान में ग्रहण किया है, वही तुम्हारा अपना स्वभाव बन जाए। स्वभाव यानी सत चित आनंद की धारा तुम्हारे भीतर से प्रगट हो, ना कि बाहर से।

इस यात्रा पर साथ साथ चलने के लिए आप सभी का धन्यवाद।

Thank you so much

Om Namah

व्याकरण संबंधी त्रुटि के लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूं।

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लॉकडाउन में अपने दिमाग का लॉक खोलें। Antas Yog by Indu Jain

यह जरूरी नहीं, कि जो लोग आपके सामने आपके बारे में अच्छा बोलते हो। वह आपके पीछे भी यही राय रखते हो खैर छोड़ो....

कुछ मत सोचो... और कब तक सोचते रहोगे कि Lockdown कब खुलेगा - कब खुलेगा बस अपने दिमाग का लॉक खोलो, जो माइंड में अनादि काल से लॉक पड़ा है बस उसकी चाबी ढूंढ लो और थोड़ा सा दिमाग चलाना बंद कर दो, क्योंकि अभी आपके हाथ में कुछ भी तो नहीं है, और जब तक हम किसी भी सोच विचार में पड़े रहेंगे, तब तक हमें आत्मिक विचार यानी वास्तविक सुख नहीं मिलने वाला। यह विचार जब आपकी चाबी के माध्यम से खुलेगा, तभी आपके दिमाग में शांति आएगी और जब दिमाग शांत होगा, तभी आपको अपनी वास्तविक सुख की अनुभूति होगी जिसे कहा जाता है रियल हैप्पीनेस।

ध्यान रहे, जो चीज जहां उपलब्ध होती है अगर आप उसे वहीं पर प्राप्त करने की चेष्टा करोगे, तो वह चीज वहीं पर मिलेगी। जिस यात्रा पर हम अंतस की धारा में है, यानी जो हमारी spiritual journey है, उसका वास्तविक आनंद, उसका स्रोत कहां है ? वह कहां से प्राप्त होगा, वह कहां पर रहता है, आज आपके पास भरपूर समय है, सोचने का, समझने का अच्छे ढंग से अभ्यास करने का।

हम अपने मन को या इंद्रियों को भटकाते रहते हैं, अपना दिमाग जरूरत से ज्यादा चला लेते हैं। तो हमें उस परम आनंद की क्षणिक अनुभूति भी नहीं हो सकती। अगर कोई चीज कहीं पर है और हम उसके थोड़ा सा भी निकट चले आते हैं तो कहीं ना कहीं उसकी थोड़ी सी अनुभूति हमारे भीतर आ जाती है।

अगर आपको भूख लगी है, और आप किसी रेस्टोरेंट में जाते हैं हालांकि आपने अभी कुछ खाया भी नहीं है, लेकिन आपको अनुभूति हो जाती है कि हां खाना जरूर मिलेगा ठीक उसी प्रकार यदि हमें पता चल जाए कि परम आनंद कहां रहता है, वह कहां से मिलता है, अगर उस परम आनंद की थोड़ी सी भी निकटता हमारे पास आ गई तो वह सोच ही हमें सुगंधित कर देगी, और जब तक हमें यह नहीं पता कि परम आनंद मिलता कहां है तब तक भटकन के सिवा कुछ भी हाथ नहीं लगेगा। सिर्फ द्वंद ही द्वंद, विषाद ही विषाद ... कि जीवन में अबआगे क्या होगा।

सामान्यता लोगों की यह धारणा है, कि जो भी हमें सुख दुख मिलता है, और उसमें यदि सुख की मात्रा बढ़ती चली जाए तो यही स्थिति हमारे को परम आनंद की तरफ ले जाएगी। दुख से हटकर सुख में जाने की चेष्टा में भी एक हम एक गलत दिशा में बढ़ते चले जाते हैं, ध्यान रहे आज हम जितना भी सुख और दुख का अनुभव कर रहे हैं वह सब मानसिक है।

पत्थर नहीं हूं मैं मुझ में भी नमी है, दर्द बयां नहीं करती बस इतनी सी कमी है।

यह केवल हमारी मनोदशाएं हैं, और यह मनोदशा क्षण क्षण में बदलती हैं। मान लीजिए आप घर में बैठे हैं अगर आप की मनोदशा अच्छी है, तो घर आपको अच्छा लगेगा अगर आप की मनोदशा खराब है, तो वही घर आपको कैदखाना लगेगा। सिर्फ मनोदशा के अनुसार ही हमारे सुख और दुख बनते हैं। किसी को घर में रहकर सुख मिल रहा है बहुत अच्छा लग रहा है, जो भी छूटे हुए काम थे वह पूरे हो रहे हैं किसी की spiritual journey बहुत तेजी से बढ़ रही है, उन्हें परम आनंद की प्राप्ति हो रही है तो दूसरी तरफ यही लॉकडाउन किसी के लिए कष्ट का कारण भी बन सकता है यह डिपेंड करता है, कि हमारे सोचने का ढंग क्या है, जब व्यक्ति सुख और दुख में ही अपने मन को भटकाता रहता है, तो वह यह सोच ही नहीं पाता कि सुख भी दुख की तरह क्षणिक होता है, यह सुख का नाम परमानंद नहीं है जिसको वह सुख समझता है। अपने मन की इच्छा के अनुसार कुछ हो गया तो हमारे भीतर हैप्पीनेस आ गई हम सुखी महसूस करने लगे ।

हमारी इच्छा के विरुद्ध कुछ हो गया तो हमारे भीतर dullness, sadness आ गई और भीतर एक क्लेश उत्पन्न हो गया। हम अपने आप को दुखी बना कर बैठ गए यह सिर्फ मन की ही दशाएं है सिर्फ मन के ही परिवर्तन है, मन की दशाओं में उस परम आनंद की अनुभूति होती ही नहीं जो व्यक्ति सिर्फ इतना ही जानते हैं कि मन की इच्छा पूर्ति से सुख मिल जाता है, वह कभी भी इस अंतस की यात्रा के पथिक नहीं बन सकते।

वह कभी भी उस परम आनंद की यात्रा पर अपने को चला ही नहीं सकते। पहले हमें यह समझना होगा कि यह परम आनंद रहता कहां है मन में रहता है, यह देखने सुनने में रहता है, इंद्रियों में रहता है, विचारों में रहता है, वह रहता कहां है इसके बारे में जब तक हम नहीं जानते हमारी स्थिति वही होगी कि हमारे पास पूंजी तो है, लेकिन किस दुकान पर क्या मिलने वाला है, और मुझे क्या खरीदना है पता ही नहीं। तुम घूम रहे हो, ढूंढ रहे हो जब तक तुम सही जगह नहीं पहुंचेंगे, तुम्हारे लिए वह भटकन बनी ही रहेगी बीच-बीच में कभी-कभी कोई आश्वासन भी दे देता है, कि हां तुम्हारे मतलब की चीज है तुम थोड़ी देर relax भी हो जाओगे, लेकिन उससे स्थाई सुख नहीं मिलेगा। बल्कि आपके भीतर यह प्यास उठ जाए, सुनते सुनते की परम आनंद ही हमारा अंतिम लक्ष्य है। उस आनन्द को प्राप्त करने के लिए यह मानव चोला मिला है। आपने अपने Mind को थोड़ा सा भी शिफ्ट किया, तो हमें भले ही उस पर आनंद की अनुभूति ना हो, लेकिन उसके निकट पहुंचने पर हमें उसकी झलकियां जरूर मिलेगी। हमें लगेगा कि वास्तविक आनंद इसी भावना में है। मैं अभी और यहीं सुखी हूं।

हालांकि अभी लॉकडाउन चल रहा है हम सभी घरों में हैं, परिवार में है, संपत्ति में है, खाने पीने सभी इंद्रियों के भोगों में है, हम सुखी होने चाहिए लेकिन हो क्या उसमें आनंद की प्राप्ति हो रही है क्या ??

अभी तो शुक्र करो, कि आप घर में बैठे हो सुरक्षित तो हो, कोरोना का यह कहर कम से कम घरों में आपको सुरक्षित किए हैं, लेकिन सोचो कभी इससे ज्यादा कहर आया तो क्या करोगे, हर चीज के लिए तैयार रहना चाहिए । इस कहर में आप घर के भीतर सुरक्षित तो हो लेकिन कुछ कहर ऐसे होते हैं जैसे भूकंप तब क्या करोगे। आपको पता चल जाए कि इस समय इतने बजकर, एक भूकंप आने वाला है फिर कहां शरण लोगे यहां सब कुछ हो सकता है। लेकिन हमारे पास कुछ ऐसा होना चाहिए, जिसके होने पर हमें किसी भी चीज से डर ना लगे अगर हमारे दिमाग में थोड़ा सा भी विश्वास आ जाए, थोड़ा भी किसी हायर के प्रति समर्पण भाव आ जाए, आकर्षण आ जाए, तो फिर रूपांतरण की घटना अपने आप घटती है, तो उस विश्वास मात्र से आपके भीतर सभी भय समाप्त हो जाएंगे। डर उनको लगता है जो अपनी अज्ञानता के कारण से उन चीजों में सुख मान लेते हैं, जिनमें सुख नहीं है, और उसी सुख में लिप्त होकर हम यह समझ लेते हैं, कि हमने परम आनंद को प्राप्त कर लिया। इसीलिए हमेशा सद्गुरु ने समझाया कि उस परम आनंद की अनुभूति के लिए यह हमारा जन्म हुआ है। और वह आनंद हम सबके भीतर में है अंतस में है, बस स्वयं के भीतर झांकने की जरूरत है बंद आंखों से.... बस अपने माइंड का लॉक खोलने की जरूरत है।

परमानंद का मतलब यही है, कि हम उस आध्यात्मिक अंतस की यात्रा पर निकले हैं, जहां पर पहुंचने के बाद फिर कोई खतरा नहीं, कोई डर नहीं जिसका विश्वास होने मात्र से आदमी निडर हो जाता है। ऐसे परम आनंद में डूबने की जब हम जिज्ञासा पैदा करते हैं, तभी आपको किसी के औरा में, सानिध्य में आने का मौका मिलता है। वह आपके जीवन की प्रमुख घटना होती है फिर उसके बाद कोई दुर्घटना नहीं घटती।

पता है, तुम्हारी और हमारी मुस्कान में क्या फर्क है तुम खुश हो कर मुस्कुराते हो हम तुम्हें खुश देख कर मुस्कुराते हैं।

Om Namah

व्याकरण संबंधी त्रुटि के लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूं।

ANTAS YOG by Indu Jain

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प्यास ही परमात्मा by Indu Jain ( Yoga Expert ) Relax Mind with Meditation

कीमत पानी की नहीं, प्यास की होती है कदर मौत की नहीं, सांस की होती है। प्यार तो बहुत लोग करते हैं दुनिया में पर कीमत प्यार की नहीं, विश्वास की होती है।

और सबका अपना अपना विश्वास होता है यानी अपनी अपनी याद। उसे कोई किसी भी नाम से पुकार सकता है। खैर ... नाम में क्या रखा है छोड़ो।

कुछ पल बंद आंखों से हम उसे याद करें और ठहर जाएं अपनी याद में जो हमें विस्मृत हुआ है। अपनी ओर उन्मुख रहना मन के स्वभाव मे खो जाने की आदत अपने आप टूटेगी। आप अपनी remembrance में रहना।

अपने को सुखद और स्वस्थ रखने के लिए अपने आपसे एक छोटी सी प्रतिज्ञा करना कि हमें जीवन में सतगुरु का साध मिले, ओर हम साधना की डोर पकड़ कर हम मन की अंधी दौड़ को अटका कर भीतर की वास्तविक शोध को प्रारंभ करें। हम अपने भीतर जरूर उतरेंगे, थोड़ी देर इस विचार को भीतर रम जाने दीजिए।

लेकिन क्या करें बार-बार माइंड की आदत हम पर हावी हो जाती है हम पुनः माइंड के साथ लगते ही dualistic state में चले जाते हैं और इस duality से बचने का एक ही तरीका है वो है मेडिटेशन। यही एकमात्र ऐसी दवा है जो हमारे जीवन में संतुलन ला सकती है। यह पॉजिटिविटी को बढ़ावा देती है और पॉजिटिव माइंड ही उस परम के निकट होता है।

बस तुम अब और अभी में रहना। जब जब तुम जागते हो तुम प्रेजेंट मोमेंट में होते हो और जब तुम अपनी वास्तविक याद में होते हो तुम अपने real residence में होते हो लेकिन आज तक किसी ने हमें अपने घर का पता नहीं बताया, इसीलिए हम बाहर के घरों में सुख को ढूंढ रहे हैं। हमने उसे वहां पाना चाहा जहां वह है नहीं। इसीलिए हमारा मन अशांत,अतृप्त और दुखी रहता है। बात बात पर हम anger and reactions करते हैं अगर तुम्हें अपने को देखने का जरा सा भी interest है या प्यास है, तो तुम्हारा देखना बहुत रुचिकर हो जाता है वास्तव में यह भीतर देखना ही भीतर की सफाई है भीतर का सुधार है, इंप्रूवमेंट है।

ढूंढना खोजना एकमात्र मिलन की घड़ी को संभव करता चला जाता है अधिक से अधिक भीतर डूब जाना भाव दशा में उस विराट के लिए चंद कुछ सांसे, जो तुम्हें एक्चुअल में सकून देगी आज तक रुदन उतरा है उस संसार के लिए लेकिन सब रुल गया अब थोड़ी देर उसके लिए भी प्यास उठे तभी आपका रोम रोम एनर्जी से भरपूर हो जाएगा, तभी तुम वास्तविक जीवन जी पाओगे।

वर्तमान में..... अब यह प्यास कभी ना बुझने पाए, न हीं तृप्त हो पाए मैं तृप्ति नहीं चाहती तृप्त नहीं होना मुझे बस प्यास ही प्यास बरसती रहे अब मुझे अनुभव हो गया कि प्यास ही परमात्मा है तू केवल प्यास में बरसता है तू केवल अश्कों में रहता है, जहां-जहां सागर उमड़ते हैं तू महासागर हो करके आता है तो एकमात्र उस रिश्ते में उतर कर आता है जिसका कोई नाम नहीं,तू unconditional love में उतरता है तू तभी पिघलता है, तू सरल सहज हो जाता है फिर तू कठोर नहीं रहता ओ... विराट विश्वास तू करुणाजनक हो जाता है, एक प्यास तुझको रिझा पाती है ऐसा मिला समंदर कुछ और प्यासा कर गया... कुछ और प्यासा कर गया।

प्यास के मारे हैं, या तेरी चाहत के मारे हैं, जो भी कह लो बस हम तो तुम्हारे सहारे हैं ओ विश्वास ...ओ विराट.... ओ मुर्शिद

Guru kripa

व्याकरण संबंधी किसी भी त्रुटि के लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूं।

आपके जीवन में इस विश्वास की कितनी importance है कमेंट सेक्शन में अपने अनुभव जरूर शेयर कीजिए।

Thanks

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