यह कैसा प्रेम का रंग Spiritual journey

ज्ञान से शब्द समझ आते हैं, लेकिन अनुभव से वास्तविक अर्थ।

किसी की वाइब्रेशंस में थोड़ी देर प्रेममय हो जाना। यह धारा समर्थ है तुम्हें व्यस्त से मस्त कर देने में, लेकिन आप कहते हैं कि मस्त कैसे होए हम ? अभी संसार का उत्तरदायित्व बहुत है, जब भी ध्यान में उतरते हैं मन भागता हैं,अभी responsibilities काफी हैं, दोनों में बैलेंस कैसे साधे, तो क्या करें?

ध्यान रहे, या तो आप अधूरे मन से सुनते हैं, या जो आपको सुनाता है वह अधूरा जानता है, क्योंकि ध्यान तो वो कला है, जिसमें किसी को कपड़ा बुनते बुनते, किसी को जूता बनाते बनाते किसी को सामान तोलते तोलते… तेरा ही तेरा भगवद दर्शन करा दिया। आपने कहीं नहीं भागना। भागने वालों को कुछ नहीं मिला, भागने वालों ने संसार से भागकर दुगना संसार पाया है। इसीलिए जहां हो, वही रहिएगा और जो घर से भागने को कहा उनकी बात बिल्कुल भी नहीं सुनना, क्योंकि करुणानिधान इतनी समर्थ है, वो जब आते हैं तो आने के लिए कौन सा स्थान चुनते हैं। आधी रात, घनघोर बरसता बादल, और कारागार के मध्य में भगवान प्रकट होते हैं। यानी वह शक्ति ऐसी स्थिति में भी प्रगट हो सकती है। भले ही आप और मैं सब कारागार में है, संसार के कारागार में है, जहां कामनाओं के मेघ बरसते हैं, और घोर अंधकार है। बस इतना भरोसा रखना, थोड़ा सा विश्वास रखना।

जब कोई नहीं आता, मेरे गुरुवर आते हैं मेरे दुख के दिनों में वो, बड़े याद आते है।

किसी शायर ने कहा

बहुत चल लिए, चलते चलते थक गए और ना मिली मंजिल नाचीज और यूं तो कहने को चलकर जाना था, जिस्म से मुझे रूह तक।

इतना ही तो चलना था बाहर से भीतर उतरना था। अंतस में जाना था, जिस्म से रूह में उतरना था, बस इतना हो नहीं पाया। बहुत चल लिए बस अब ठहर जाओ उसे आने दीजिए।

अब आप मत खोजिए, उसे आप को खोजने दीजिए। अब आप मत पहचानिए उसे आपको पहचान जाने दीजिए, आप तो बस भीतर डूब जाएं

जिंदगी दी है तो जीने का हुनर भी दे दे गुफ्तगू दी है तो बातों का असर भी दे दे।

मैं किसी और के हाथ से समंदर भी ना लूं। एक कतरा भी समंदर है, तू अगर दे दे।

गुरु की कृपा से नाम मिला हो, बस एक बार अपने तन मन प्राण लगा दीजिए। प्रत्येक प्रश्न के उत्तर में एक बात कहिए अपने आप से…

जीने का सहारा तेरा नाम रे मुझे दुनिया वालों से क्या काम रे…

‌‌किसी की वाइब्रेशंस का जीवन में आना कैसा है, जैसे प्रभु के आगमन का संदेशा आया हो, ध्यान रहे अन्य सब साधनों में प्रयास है, प्रयास में परिश्रम है। पर इस धारा में कोई प्रयास ना हो, सारी कोशिशें छोड़ दीजिए वही है प्रेम, वही है भक्ति का रंग। वही भक्ति शुद्ध है, यह सब कुछ स्वीकार करती है। इसमें सर्व को स्वीकार करने की सामर्थ है, कोई कैसा भी आया हो। केवल अमृत की स्वीकृति ही, भक्ति में नहीं है, अगर केवल अमृत की स्वीकृति होती तो मीरा केवल चरणामृत स्वीकार करती। इसमें विष की भी स्वीकृति है, और केवल स्वीकृति ही नहीं, सामर्थ्य भी है विष को अमृत में परिवर्तित करने का। इसीलिए यह प्रेम शुद्ध है अवरुद्ध है, ध्यान रहे यदि सद्गुरु द्वारा दी गई वो भीतर की दृष्टि ही ना हो, तो भगवान सामने से होकर चले जाएंगे। आप पहचान भी नहीं पाएंगे, इन बाहर के चक्षुओ से भगवद दर्शन नहीं होगा। श्रद्धा और विश्वास के दो नेत्र आपके भाव देह के पास में है। वह श्रद्धा और विश्वास के नेत्र जब देखते हैं तभी भगवान दिखाई देते हैं। और वह नेत्र बिना गुरु कृपा के देख नहीं पाते, बिना नयन पावे नहीं, बिना नयन की बात।

बहुत गहरी बात है, जिनके जीवन में संत कहो, गुरु कहो, कोई बुद्ध पुरुष नहीं होता उनकी चेष्टा बता देती है, इनके जीवन में कोरा सत्संग है, यानी जो सिर्फ सुनने वाला होता है,और बहुत लोग तो ध्यान से सुन भी नहीं पाते, क्योंकि या तो वह देखने के लिए आते हैं कि क्या चल रहा है या स्वयं को दिखाने के लिए आते हैं।

थोड़ी देर बंद आंखों से भीतर झांकना, सभी बुद्ध पुरुषों का एक ही संदेश है, कि यदि तुम मनुष्य जीवन में आ ही गए हो तो, इस मनुष्य जीवन की जो परम संभावना है वहां की यात्रा का आरंभ कीजिए और अंत भी। सत्संग, ज्ञान, ध्यान की धारा तुम्हें सिर्फ दिशा देगी, समझा सकती है, लेकिन साधना तुम्हें स्वयं करनी होगी और वही साधना तुम्हें उस अनुभव तक लेकर जाएगी कि जो भी तुमने सत्संग में समझा है ध्यान में ग्रहण किया है, वही तुम्हारा अपना स्वभाव बन जाए। स्वभाव यानी सत चित आनंद की धारा तुम्हारे भीतर से प्रगट हो, ना कि बाहर से।

इस यात्रा पर साथ साथ चलने के लिए आप सभी का धन्यवाद।

Thank you so much

Om Namah

व्याकरण संबंधी त्रुटि के लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूं।

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Comment (1)

  • Rachna Sethi Reply

    Very beautifully expressed Mam ♥️

    April 19, 2020 at 9:45 am

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